अपनी राखी

जिस दिन मिलेंगे हम उस दिन होगी अपनी राखी
सब पर्व एक हो जाएँगे विशु, नववर्ष औ बैसाखी
बस यही नहीं पता कि दिन और हैं कितने बाक़ी

सच का हिस्सा

बाहर का झूठ निभाना अगर मजबूरी है
अंतर के सच को ज़िंदा रखना भी ज़रूरी है
ना मिले या मिलते रहें यूँ ही हम यदा-कदा
तुम मेरे सच का हिस्सा हो और रहोगे सदा

कंकरीट में ढले और शीशे से सजे सब रिश्ते
मोल जिनका करे मांग-आपूर्ति की किश्तें
इनसे हटके है बहुत अपने सम्बंध की अदा
तुम मेरे सच का हिस्सा हो और रहोगे सदा