पहली बार

“आई एस एम चलोगे?”
“माइनिंग कॉलेज?”
“हाँ, वही | कितना लोगे?”
“पंद्रह रुपिया |”
“दस में चलो |”
“पहली बार आये हो का?”

सच, पहली बार ही आई एस एम धनबाद गया था तब वह | पकड़ा गया था | कई बार लुट चुका था यूँ वह पहली बार जाकर | पुरानी दिल्ली स्टेशन के बाहर से ऑटो लेकर जब वह पहली बार चला था, ऑटो वाले ने “मुस्कुराइए कि आप दिल्ली में हैं” कहकर चूना लगाया था | वो सबक उसे अच्छी तरह याद था | इसलिए किसी और समय मुंबई एयरपोर्ट से नवी मुंबई जाते हुए टैक्सी वाले से लड़ पड़ा था | भाड़ा एक तय हुआ था और हर दो किलोमीटर पर टैक्सी वाला अतिरिक्त कर की बात कर रहा था | मौका पाते ही उसने एक डायलॉग मार दिया था: “ये मत समझो कि हम पहली बार आये हैं |”

थोड़ी नोक-झोंक के बाद टैक्सी वाले ने ब्रम्हास्त्र फेंका था: “ए, जास्ती शहाणपना करने का नई | इदरीच सटका दूंगा अपने भाई को बुलाकर |”

चुपचाप नोट थमा दिए थे उसने टैक्सी वाले के हाथ |

वह सोचता था कि पहली बार का नाजायज़ फायदा केवल भारत के लोग उठाते हैं | इधर अमेरिका में भी नौकरी के चक्कर में घूमते घूमते महसूस हो रहा था कि जब तक उस देश में काम न करो, आपका कोई अनुभव नहीं है | भारत में दस साल का मैनेजमेंट का तजुर्बा गया भाड़ में | फिर एक नयी शुरुआत की थी | खूब मेहनत की थी पांच साल तक | बीच में एक तरक्की भी मिली थी |

फिर उसने सोचा था कुछ और पढ़ ले | यूनिवर्सिटी में पूछताछ की तो पता चला कि फिर से मास्टर्स करना पड़ेगा क्योंकि अपने देश के पोस्ट-ग्रेजुएशन को वहाँ कोई पूछता नहीं था | थक चूका था वह यूँ बार बार जन्म लेते हुए | मानो सालों की ज़िन्दगी उसने जी ही नहीं |

हद तो तब हो गई जब वह दूसरी नौकरी के सिलसिले में एक छोटे शहर गया था | संगीत में अच्छी खासी दिलचस्पी थी उसकी | गा-बजा भी लेता था | सो देसी समुदाय में मेलजोल बढ़ाने के लिए वहाँ एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में हिस्सा लेने गया था | वहां भी देसी लोगों ने उसका पूरा इंटरव्यू लिया था | फिर एक देसी नेता ने फैसला सुनाया कि वह केवल कोरस में गाने के क़ाबिल है | वह समझ गया था कि वहाँ भी पहली बार आया था | और क्या उम्मीद कर सकता था भला |

आज प्लेन में बैठे बैठे यह सब घटनाएं याद आ रही थी | लेकिन आज वह छाती फुलाये बैठा था | अपने देश जो जा रहा था – दूसरी बार |

*****

ट्रेन धनबाद स्टेशन से निकल चुकी थी | उसे जाना था फुसरो – अपने माता-पिता के घर | अभी कुछ मिनट पहले ही उसकी पिछली ट्रेन धनबाद पहुंची थी | हावड़ा स्टेशन पर उसने फुसरो की टिकट मांगी थी तो क्लर्क ने धमकाते हुए धनबाद की टिकट थमा दी थी | और जब उसने हावड़ा-धनबाद ट्रेन में कंडक्टर से टिकट फुसरो तक बढ़ाने की बात की तो कंडक्टर उसे घूरता हुआ आगे निकल गया था | धनबाद में उसके पास दो विकल्प थे – जोखिम उठाकर स्टेशन से बाहर जाकर फुसरो की टिकट ख़रीदे या बिना टिकट फुसरो की ट्रेन में चढ़ जाए | उसने दूसरा विकल्प चुना था | दिन में बस एक ही ट्रेन जाती है फुसरो | उसको मिस करने का खतरा भला वह क्यों मोल ले? वैसे नैतिकता की दृष्टि से वह अपराधी नहीं था क्योंकि हावड़ा-धनबाद और हावड़ा-फुसरो का किराया एक ही था | और चंद रुपये बचाकर वह क्या कर लेगा जिनका मूल्य कुछ अमेरिकी सेण्ट भर था !

थोड़ा स्थिर होते ही उसे सामान की चिंता सताने लगी | ट्रेन में कई तरह के लोग थे | कपड़े-लत्ते वाले सूटकेस की उसे उतनी परवाह नहीं थी जितनी लम्बे बैग की थी जिसमें किताबें थीं जो उसने कोलकाता पुस्तक मेले में खरीदी थी | एयरपोर्ट से वह सीधे पुस्तक मेले पहुंचा था | इस क़दर लगाव था उसे हिंदी साहित्य से | मन बहलाने के लिए उसने एक किताब निकाली |

इससे पहले कि वह एक शब्द भी पढ़ पाता, एक अजीब ख़याल ने उसे घेर लिया | हाल में उसकी ज़िन्दगी में जो भूचाल आया था, कहीं वह उससे भाग तो नहीं रहा है? ना, उसने खुद को सांत्वना दी | इतनी दूर अमेरिका से भारत वो आया था अपने रोगग्रस्त माता-पिता से मिलने | नेहा से हुए मनमुटाव से इसका कोई लेना देना नहीं था | और वह ऐसा सोचे भी क्यों? इस दौरे की प्लानिंग उसने कई दिनों से कर रखी थी | तब नेहा के वह इतना क़रीब भी नहीं था | बस जान-पहचान थी | पार्टियों में कभी-कभार मुलाक़ात हो जाती थी |

फिर, क़रीब चार महीने पहले… एक दिन मंदिर की लाइब्रेरी में उसने नेहा को कुछ दूरी पर किताबें टटोलते हुए देखा था | एक बांग्ला-भाषी को इस तरह हिंदी किताबों के बीच देखकर उसे जागरूकता हुई थी | पूछने पर पता चला था कि नेहा की भी हिंदी साहित्य में गहरी रूचि थी | बस फिर क्या था? कुछ ही दिनों में दोनों अच्छे दोस्त बन गए थे | अक्सर दोनों ऑनलाइन चैट किया करते थे किसी किताब या किसी लेखक को लेकर | पार्टियों में भी दोनों एक दूसरे से बातें करते नज़र आते थे | पहली बार उसे उस देश में कोई अपना लगने लगा था |

फुसरो से दो स्टेशन पहले एक कंडक्टर ट्रेन में दाखिल हुआ | देखते ही वह दौड़ के पास गया और उसने अपनी टिकट न काट सकने की दास्ताँ सुना दी | कंडक्टर ने सब कुछ ध्यान से सुना | फिर अपनी रसीद बुक निकाली और उसे जुर्माना भरने को कहा | वह हक्का-बक्का रह गया | जुर्माने के कारण नहीं | डॉलर में उस जुर्माने की कोई ख़ास कीमत नहीं थी | परन्तु उसका अपने देशवासी से विश्वास उठ गया था उस वक़्त | कोई कैसे एक भले आदमी की नेकी का इस तरह फायदा उठा सकता है?

वापस अपनी सीट पर आकर उसने वही किताब उठा ली | एक पन्ना पढ़ने पर उसका मन कुछ हल्का हुआ | मगर पन्ना पलटते ही आँखों के आगे नेहा की तस्वीर घूमने लगी | आंसू की बूँद के लेंस द्वारा शब्द विकृत और धुंधले होते गए |

एक महीने पहले नेहा को अपने कुछ लेख दिए थे उसकी प्रतिक्रिया जानने के लिए | अगली बार जब उनकी मुलाक़ात हुई थी, उसने उसके पति के बारे में कुछ जानना चाहा था | बस | तबसे नेहा उससे कतराने लगी थी | उसने बहुत कोशिश की थी संपर्क पुनः स्थापित करने की | उसकी बेरुखी का कोई कारण वह समझ नहीं पाया था | नेहा ने कभी कुछ बताया भी नहीं | बस मेलजोल बंद कर दिया था | सम्पूर्ण रूप से |

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खाना परोसते समय माँ ने उसके भीतर की मायूसी भाँप ली थी | वजह पूछा तो उसने ट्रेन वाली घटना बता दी | नेहा की बात वह कह नहीं पाया |

माँ ने कहा: “तू हमेशा ऐसे भोला क्यों बना फिरता है? तेरा भोलापन अच्छा लगता है मुझे | पर दुनिया कोई घर तो नहीं है | बाहर चालाक लोगों से चालाकी से पेश आना पड़ता है |”

“माँ, दुनिया में पहली बार आया हूँ न | इसलिए दुनियावाले लूट रहे हैं मुझे |” फिर माँ की गोद को माथे से छूते हुए वह बोला, “तू मुझे दूसरी बार भी ले आना इस दुनिया में | तब शायद कोई न लूटे |”