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दस्तक

कहीं से उठकर फिर एक दिन चला आता है
रिवाज़ों को गोद लिए पलछिन चला आता है

इस उम्र में अच्छा नहीं लगता है जो दस्तूर
न जाने क्योंकर भला तुम बिन चला आता है

बड़ा हो गया हूँ अब तारीख दस्तक नहीं देते
दुआ बूँद में भर आँसू लेकिन चला आता है

छुप जाती हो तुम फिर कभी न आने के लिए
औ’ बचपन मेरा दस तक गिन चला आता है

कलाई

घड़ी उतार दी थी एक बार
फिर कभी पहनी भी नहीं
सूनी हो गई थी कलाई
बात समय की नहीं रिश्तों की थी
आज भी सूनी ही है कलाई
हाँ उम्मीद ज़रूर है
कि बात रिश्ते की नहीं बस समय की है

कैसे भूलूँ

वो तारीख कुछ और थी
चन्दन भी नहीं, रंग था
माथा मगर था मेरा
और हाथ तेरा संग था

उसी दिन की याद में
दिन आज बिताना है
यादों का ये रिश्ता है
यादों से निभाना है

“नौ बरस लम्बे थे ना?”

जो होते लम्बे, हमसे आगे निकल जाते
तन्हाई में उफनते जज़्बात निगल जाते
महज आंकड़े हैं ये उम्र के हिसाब के
करें क्या मोल ये सदियों के ख्वाब के
तय करना है अभी पूरी कायनात का सफर
प्यार से लम्बी कभी ना होगी वक़्त की उमर

 

आती रहें यूँ बहारें

भटकती फिरती हैं दुआएं, इनका मक़ाम नहीं होता
क्या बताऊँ तुझे कि परछाई का कोई नाम नहीं होता

जश्न आज भी मनाता हूँ, मन्नत मांगता हूँ अब भी
अथाह चाह का ये खज़ाना कभी तमाम नहीं होता